[08/02, 11:01 am] Gayatri: ना मंजीलो की हसरत...ना गुजरी राह का हिसाब
चलने का नाम है जिंदगी चाहे अधुरे हो ख्वाब
..
गायत्री.....
[10/02, 10:52 am] Gayatri: हवा जैसी रूक सी गयी थी
और रात बहोत ही लंबी थी
सारी रात एक गहरा सन्नाटा
मेरे हर खयाल को कुरेदता रहा
तुम क्या गये जैसे सुना हो गया शहर
देर रात के बाद भी नही आयी सेहर
धीमा सा सुरज था और थी सर्द हवाये
दूर तक जाते रहे खामोश सुनसान रास्ते
ना तुम आये ना ही कुछ खबर आयी
मै सहमी सी ढलते दिन को ताकती रही
धूप मे सुखाने रख दिये फिर मैने वो पल
जो अबतक है गिले और कर रहे बेकल
तन्हा शाम आयी कुछ उदास उदास सी
बैठी रही तुम्हे सोचती आज भी मायूस सी
ना दिन आया ना शाम हुवी बस गुजरा कुछ वक्त
हमसफर तुझसे बिछडना हमेशा रहेगा सख्त
फिर बाते की मैने तुमसे मन ही मनमे अपने
मै यहा बेजान जैसे तुम साथ ले गये धडकने
गायत्री
[10/02, 10:53 am] Gayatri: एक वादा था एक दुजे से
याद आयी तो चांद से मिल लेंगे
आज क्या था बहाना
याद आये इसलिये चांद देखा
या चांद देखकर तुम्हे याद किया
चांद भी आजकल कुछ अधखीला रहता है
कुछ कशीश दिल मे छुपाये रखता है
कुछ लम्बी थी अमावस.की रात
कई सालो से चांद को इंतजार रहा
उन.प्यासी निगाहो का
चांद आया भी तो कैसे
एक बोझ ...एक कर्ज लिये मन मे
.
आज भी है चांद का कुछ वास्ता उन वादोंसे
उन ताकती निगाहों से .
एक था वादा...चांद को देखेंगे...जब जब याद करेंगे
शायद वो आज भी याद करते हो
लेकीन चांद आता ही ना हो उनके आसमान पर.
.........गायत्री........
[10/02, 10:54 am] Gayatri: सबसे ज्यादा शोर
अनकही बाते करती है
अंदर ही अंदर
उनका एक गीत
गुंजता रहता है
तनहाई के परबतोंके दुसरी और
एक खामोश एहसास रेहता है
और वजूद भी होता है
उन अनकही बातोंका .................
जिनकी धुंदली परछाईया
मिलती है चांद से कभी
फलक अपनी सारी
चांदनी बिखेर देता है
उन अनकही बातोंके लिये
रात ख्वाब बुनती है
लोरी सुनाती है उन अनकही बातोंको........
और हर वो बात बिना लफ्जोंके बुनी जाती
एक असीम सुंदर से रिश्ते मे
....फिर बस
एक दुसरे से अंदर ही अंदर बाते करती है
कुछ अनकही बाते .........
गायत्री......
[13/02, 9:15 am] Gayatri: कितने दफे ये शाम
गुजरती रही मेरे चौराहे से
बस दो कदम ठिठकके जाती
धूल सी जमी थी उसके कदमो पे
उसका रात तक का सफर अभी बाकी था
मैने बहोत चाहा उस शाम को रोक लू
और उसके पांव के छालोंपे मरहम लगा दू
बस वो कुछ पलोंके लिये रुकती
और मेरी आखो मे कुछ खोजती
मेरे खामोशसन्नाटे की आवाज सुनती .......
लेकीन 'उन' कदमो की
पहचानी आहट कही गुम थी
वही ,........
जहा शाम अपने पैरो मे
धूल चढा कर आयी थी
पैरो मे कुछ चुभ रहा था
शायद आंख से गिरा ख्वाब था
जर्रा जर्रा रोक रहा था.................
फिर भी शाम का सफर बरकरार था
काश के मै रोक पाती
कुछ लम्हे उस शाम को अपने लिये
कितने दफे ये शाम
गुजरती रही मेरे चौराहे से
गायत्री ..........
[13/02, 9:15 am] Gayatri: तरस जाते है जब दीदार ए यार को
आईने के सामने खुद को निहार लेते है....
....गायत्री....
[27/02, 4:18 pm] Gayatri: कही अनकही हर बात से कई सवाल कर लेते है
एक ही बात को.लेकर मन मे हजार जवाब पा लेते है
गुलशनसे समेटने है खुशबू के हजारो महकते झोंके
मौसम के कई नजारे बहारो से हासील कर लेते है
तरस जाते है जब दिदार-ए-यार को
आईने के सामने खुद को निहार लेते है
शायद वो भी खडे हो खुद को निहारते
सोचकर बेखुदी मे खुदको संवार लेते है
..
सफर बेचैनी का कर गया इस कदर आबाद मुझे
खामोश तनहाई के साथ राते आसानी से गुजार लेते है
सौ.गायत्री मुळे....
[05/03, 8:28 am] Gayatri: फिर एक शाम ने हिसाब मांगा
फिर मैने कुछ राते गिरवी रख दी
गायत्री ..
[06/03, 8:24 am] Gayatri: दिल के जख्मोंसे पुरानी यादोंका खून रिसता रहा
जब सच्चे दिल को ढुंढा ,हर चेहरे से नकाब उठाता रहा
बेवजह बढते गये मेरे कदम उस शख्स की तरफ
जिसे उम्रभर रास्तोंका खौफ सताता रहा
ऐतबार की हद कर दी दिल ने मेरे.
वो कुछ और था , कुछ और जताता रहा
आज फिर उसकी यादो का कारवा चल पडा
आज फिर मेरा दिल मुझको बहलाता रहा
अजनबी बन कर मिलते रहे एक दुसरे
हर चेहरा अपनी असलीयत छुपाता रहा
.....
गायत्री.............
[08/03, 8:58 am] Gayatri: मै फडफडाती हू उस चिडीया जैसी
जो पिंजडे मे कैद है सालोंसे
और उस मछली की तरहा जो जल बिन हो
कुछ सांसे उधार लेती हू जिंदगी से
और उन पेड की टहनीयोंको देखती हू
जहां घोसलें भरे है ( चूजोंसे ?)
और इंतजार करते है मां बाप के आने का
वहां बहोत शोर होता है
जो बहोत शांती देता है
शोर की खामोषी से शोर की शांती कई गुना अच्छी होती है
फिर वो पिंजडे की चिडीया अपने पर उठाती है ये सोचकर के
कही मै उडना भूल ना जाऊ
उसे आज भी ललक है आसमां को छुने की
वो देखती है पिंजडे से उस आसमां के तुकडे को
और मै देखती हू उसे
मेरे आस पास ना कोई पिंजडा है ना खुला आसमां
लेकीन मेरे तो पर भी नही जो आसमां अपनी आगोश मे भर लू
लेकीन मेरे सपने है
सालोंसे जतन किये हुवे
और कुछ टहनीया है
कल
शायद उसके बाद
या फिर बरसो बाद
उन सपनोंकी टहनीयोंपे कही ना कही घोंसले होगे
और वो शोर होगा जो बहोत शांत होगा
गायत्री ...
[08/03, 8:58 am] Gayatri: ना मंजील मिली ना रास्ता मिला
ना अंजामे-ए-उल्फत मे मेहेरबां मिला
बस एक तारा अपनी जगह से तुटा
और .......कारवा चल दिया
....
गायत्री.
[30/03, 9:37 am] Gayatri: सोचा था रोक लेगें
उठ कर महफ़िल से चल दिये
वो देख रहे थे जाते हुये
बस देखते ही रह गये
"गायत्री"
[04/04, 10:44 am] Gayatri: ऐसेही झुलसती दोपहर मे
मै चली आ रही थी उस रास्ते
जिसपे तुम्हारे कदमो के निशां भी नही थे
और अचानक तुम्हे देखा ..
जैसे किसी पराये इंसान से मिली हो
तो यूं लगा के अब तक की तपन बहोत कम थी .
बस बदन ही झुलसा रही थी
और मन जल ही रहा था
मैने पास मे खडे उस
ऱंगीन पलाश को देखा
गुलमोहर भी सुर्ख था
और अबतक सुर्ख है
मेरे पैरोंके के निशां
जो तुम तक आते आते
अब थक चुके है
यूं सहज लहजे मे तुमने पुछा
" तू है ये ? ये तू ही है ?"
शायद .!!
मै वही हू.
यही मै हू.
वही तो हू मै ........
गायत्री .................
[20/04, 6:09 pm] Gayatri: मैने सुनी थी शायद
दस्तक जिंदगी की
खडी थी चौखट पे मेरे
और पुछ रही थी मुझसे ही मेरा पता
मैने कहा थोडी देर तू रूक जा
........क्यू की
एक अनदेखी दिवार का
अभी गिरना बाकी है.
मायूस सी जिंदगी .. बैठी रही मेरे इंतजार मे
और मै उन सवालो मे उलझी रही
जो कभी सुलझेही नही
उलझताही रहा एकेक धागा.......
मायूस जिंदगी बैठी है शायद अब भी इंतजार मे
गायत्री ... ( repost)
[08/05, 2:33 pm] Gayatri: ऐ जिंदगी...
अब तुकडो मे मिलना छोड दे
कांच की तरह बिखरे है हम
चुभनेसे पहले अपना रुख मोड ले
गायत्री .....
[20/05, 10:07 am] Gayatri: बेवजह बढते गये मेरे कदम उस शख्स की तरफ.
जिसे उम्रभर रास्तोंका खौफ सताता रहा
.
गायत्री..
[21/05, 8:27 am] Gayatri: हम सर झुकाये सजदे मे खडे रहे
वो दुनिया झु काने मे मासरूफ रहे
गायत्री
[22/05, 8:50 am] Gayatri: मेहसूस करने की बहोत सी बाते होती है तुम्हारे खत से तुम्हारी खुशबू आती है
शायद जिंदा हू मै .. ये कैसी आवाज है?
दिल के कोने मे दबकर उसकी याद रोती है
गायत्री
[28/05, 8:42 am] Gayatri: नही कर सकती मै माफ उन शख्सोंको
जिन्होने मेरी आत्मसम्मान को ठेंस पहुंचाई है
ना माफ कर सकती उन लोगोंको
जो मेरे अपमान मे मेरी तरफ पीठ करके खडे रहे
ना ही मै माफ कर सकती हू जो देखते, सुनते रह गये थे
उस अपमान के बाद जो मेरे अंदर की अच्छाईयोंका गला मैने घोंट दिया था
ना मै कभी माफ करुंगी खुदको
क्युं की मेरे खामोशी को
जो मेरी कमजोरी समझते गये
उन्हे मै बर्दाश्त करती रही
मै कभी खुद को माफ नही कर पाऊंगी
उन पलोंको जब मैने मेरा आत्मा कुचल दिया था
और दुसरोंकी बदहाली के सपने देखती रही
फिर एक दिन मै भी उन सब मे से एक बन गयी
जो हर बात पे सबको आहत करने लगी
मेरे अपमान के बदले मे खुदकी अच्छाइयाँ गिरवी रखकर मै उन मे से एक बन गयी
मेरी अच्छाइयोंकी बातें अब कभी कोई करता है
तो मै हैरान रहती हूँ ... कहां हूँ मै?
क्युं हूँ मै इस आज मे ऐसे?
इस हैरानी को मै कभी माफ नही कर सकती...
साक्षात हो कर भी जब चीरहरण नही टल पाया था
तो उस भगवान के भरोसे रहने वाले मेरे मन को
मै कभी माफ नही कर सकती.
जब मै खुदको बदलने को तय्यार नही हूँ
और दुनिया बदलकर सब अच्छा हो जायेगे
मेरे इस सोच को मै कभी माफ नही कर पाऊंगी
उस कमजोर पल को मै कैसे माफ करू? जब पुरी तरह से मै खुद को समाप्त करने वाली थी तब वो समेटता चला गया मेरे घजीने की चाह को
जब मुझे याद आता है बचपन के लम्होंका सफर ...
मध्दम मुस्कुराती हूँ ..
आज शायद याद नही कब मैने अपनी हसी को आईने मे देखा है
मै उस आईने को माफ कैसे करू जो मेरा वजूद मेरे सामने रखता हो मगर एक कांच के तुकडे के अंदर ..
उस कांच से मै ना उसे छू सकती हूँ ना मिटा सकती हूँ
मै कैसे माफ करू इस आईने को ..
गायत्री ....
[04/07, 8:23 am] Gayatri: मेरी तन्हाई को खामोश कर दे कोई
अंदर का शोर अब परेशां करने लगा है
गायत्री
.............